| صورةٌ |
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(1) |
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| في مرآة . |
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تقدَّسَ سرُّها |
| |
| الغبار، |
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أخافُ عليها من ثلاثة : |
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| والخروج . |
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وعيونِ المارقين ، |
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| يلفُّ رأسَها المقطوع |
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(2) |
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| أداتُها الوحيدة |
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منديلٌ أغبر، |
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| تقرأُ الغبارَ كلَّ يوم . |
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خرقةٌ مبلَّلة |
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| من الأدب ؟! |
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تنظّفُ الرّفوفَ |
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| من الفراغ ؟! |
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أم بطنَها |
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| لأنَّها المرّةُ الأولى |
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(3) |
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| كانَ الغبار |
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منذ 408 للهجرة ، |
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| أوّلَ المستقبِلين . |
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(رضيَ اللهُ عنه) |
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| آخرَ من يودِّعُني |
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وسيكون ... |
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| إلى الشّمال . |
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عندما أعود |
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| العصفورُ الهارب |
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(4) |
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| لم يكن يعرف |
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إلى الجنوب ، |
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| هو كانون الثّاني |
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أنَّ \"طُوبَة\" |
| |
| وأنَّهُ يحمل |
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|
الّذي هو يناير ، |
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| فضلاً عن الغبار ، |
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على ظَهْرِه ، |
| |
| من بردٍ وسلام . |
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كيسًا |
| |
| جئْتُ ، |
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(5) |
| |
| صورةً |
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لأنَّ لي هنا |
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| في مرآة . |
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|
تقدَّسَ سرُّها |
| |
| إلى الجحيم . |
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|
وليذهبِ الكتاب |
| |
| لا تخافُوا أيّها الأحبّة |
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|
(6) |
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| ليسَتْ لي نيَّةٌ |
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الوافدونَ من الشّمال ، |
| |
| من تحتِ أحد . |
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في سَحْبِ البساط |
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| فضاؤُكم، |
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|
ألا يتّسع |
| |
| لعصفورٍ |
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|
هنا أيضًا ، |
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| (7) |
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يحبُّ البياض ؟! |
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| أنَّى ذهبَتْ . |
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|
تأكلُها العيون |
| |
| حَسَبَ التّرتيب ، |
|
|
تبصقُهم جميعًا |
| |
| أحمرِ الشّفاه . |
|
|
ولا تعيد ترتيبَ |
| |
| أعقابَ مجاملاتِهم |
|
|
وتدوسُ بكعبِها العالي |
| |
| ثمَّ تمضي |
|
|
غيرِ السَّلِسَة . |
| |
| أسيرةَ حًلُمٍ |
|
|
إلى غايتِها |
| |
| إلاّ إذا استحمَّ كلَّ يومٍ |
|
|
لا يفهمُهُ اللَّحْم |
| |
| خَمْسَ مرّات . |
|
|
في البحرِ الميّت |
| |
| أحبُّكِ ... |
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|
(8) |
| |
| ولن يفهمَني أَحَد . |
|
|
كما تشتهين . |
| |
| وأخافُ ، |
|
|
ولن يصدِّقُوا شاعرًا . |
| |
| أن أكونَ مثلَهم ، |
|
|
في نهايةِ المطاف ، |
| |
| من جديد ، |
|
|
وتخسري الرّهانَ |
| |
| (9) |
|
|
وأخسرُني . |
| |
| دمّرْتُ أسلحةَ الدّمارِ كلَّها . |
|
|
كيلا تخسري الرّهان ، |
| |
| عادَ إلى طفولتِهِ |
|
|
ما كانَ رأسًا نوويًّا |
| |
| (10) |
|
|
ونام . |
| |
| إلى المطعم ، |
|
|
ذهبْتُ وحدي |
| |
| في الأمس . |
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|
حيثُ كنَّا |
| |
| لم يكن |
|
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طلبْتُ الطَّبَقَ ذاتَهُ . |
| |
| (11) |
|
|
طيّبًا . |
| |
| عندما التقَيْنا . |
|
|
كان عمري 48 خريفًا |
| |
| أصْغُرُ أسبوعًا ، |
|
|
صرتُ كلَّ يومٍ |
| |
| وكلَّ شهرٍ سنة . |
|
|
وكلَّ أسبوعٍ شهرًا ، |
| |
| بَقَى\" . |
|
|
\"احْسِبِيهَا لْوَحْدِكْ |
| |
| أخرجْتُهُ . |
|
|
(12) |
| |
| الحمدُ لله . |
|
|
ظهَّرْتُ الصُّوَر . |
| |
| ما زالَتِ الصُّورَة . |
|
|
والشّكرُ لآلةِ التّصوير . |
| |
| في المرآة . |
|
|
تقدَّسَ سرُّها . |
| |
| لم تستطِعْ واحدةٌ |
|
|
(13) |
| |
| مثلما فعلْتِ . |
|
|
أن تعيدَ تكويني |
| |
| عمَّا يقولونَ |
|
|
سبحانَكِ تعالَيْتِ |
| |
| (14) |
|
|
ولا يفعلون . |
| |
| سأعيدُ ترتيبَ أوراقي |
|
|
حينَ أعودُ إلى الشّمال |
| |
| سأوزّع |
|
|
بموجبِ اللّوائحِ الفاطميّة . |
| |
| في السّلام |
|
|
على المسلِّمينَ درسًا |
| |
| (15) |
|
|
مع النَّفْس . |
| |
| التّدخينُ يدمِّرُ الصّحّة |
|
|
احْتَرِسْ |
| |
| والشِّعرُ أيضًا |
|
|
ويسبّبُ الوفاة . |
| |
| لا يبيع . |
|
|
لكنَّهُ |
| |
| عقلي طيّبُ القلب |
|
|
(16) |
| |
| لقلبي قليلِ العقل |
|
|
لا يسمح |
| |
| سأظلُّ عاقلاً |
|
|
أن يغرِّرَ بأحد . |
| |
| إلى أن يطلبَ الجنون |
|
|
جدًّا |
| |
| من قوّةٍ صديقةٍ |
|
|
نجدةً |
| |
| ونطير . |
|
|
تحبُّ الهمالايا |
| |
| كائناتٌ |
|
|
(17) |
| |
| يدخلونَ مطعمًا شعبيًّا |
|
|
من كوكب الإنترنت . |
| |
| يثرثرونَ فوقَ النّيل |
|
|
في قلبِ القاهرة . |
| |
| يكشّرونَ ويضحكون |
|
|
ويأكلونَ الكُشَرِيّ . |
| |
| يعملُها المسنجر . |
|
|
بلا وجوهٍ عبيطة |
| |
| وأخيرًا |
|
|
(18) |
| |
| بما لا يشتهي الحُلُم . |
|
|
يخرجُ المولود |
| |
| لا ألومُ القابلة |
|
|
حسنًا |
| |
| وأسناني |
|
|
ولا المستشفى . |
| |
| بما فيه الكفاية |
|
|
ليسَتْ مترفةً |
| |
| لا بأس |
|
|
لارتكابِ عضّةِ إصبع . |
| |
| وأمضي |
|
|
سأتوحّدُ مع الكتاب |
| |
| عن البكاء |
|
|
بعينَيْنِ عاجزتَيْنِ |
| |
| (19) |
|
|
في حضرةِ القابلة . |
| |
| سادرةٌ في بلّورِ الرّوح |
|
|
قصيدةٌ |
| |
| سادنٌ |
|
|
إلى حدِّ البكاء . |
| |
| يقرأُها علينا |
|
|
أحبُّهُ كما أحبُّ إخوتي |
| |
| في نفسِ يعسوب : |
|
|
لـ 48 غرضًا |
| |
| لتصرفَ النّظر |
|
|
ليدرأَ عاصفةً وشيكة ، |
| |
| كقابلة . |
|
|
عن مهنتِها |
| |
| ليسَتْ |
|
|
الأغراضُ المتبقّية |
| |
| (20) |
|
|
من اختصاصي . |
| |
| \"عصفورةَ الجنوب\" ، |
|
|
جَنينٌ يُدعى |
| |
| في رَحِمِ الرُّوح . |
|
|
يتشكّل |
| |
| على يديها ، |
|
|
سيولد |
| |
| تعالَتْ . |
|
|
وبإذنِها |
| |
| لنصرفِ النّظر |
|
|
(21) |
| |
| كما الحبرُ يشتهي ، |
|
|
عن إعادةِ التّوليد |
| |
| نسفِّهَ الورق ، |
|
|
لئلاّ |
| |
| سنتمترَ آخرَ |
|
|
ولئلاّ يزيد |
| |
| (22) |
|
|
حزنُ القابلة . |
| |
| لا يملأُها التّراب . |
|
|
مناشيرُ فارغةُ العيون |
| |
| وتدعو لَهُ |
|
|
تحبُّ الشّجرَ الغريب |
| |
| (23) |
|
|
بطولِ الإقامة . |
| |
| وقلبِ الجنوب |
|
|
بينَ عقلِ الشّمالِ |
| |
| ليسَتْ باردة . |
|
|
حربٌ |
| |
| غيرُ باردَيْن |
|
|
بردٌ وسلامٌ |
| |
| وجنوبِ العقل . |
|
|
بينَ شمالِ القلبِ |
| |
| أخذْتِ الكتابَ بقوّةٍ |
|
|
(24) |
| |
| عادَ بخُفَّيْ قرفةٍ |
|
|
وأمعنْتِ في ليلِ القبيلة . |
| |
| قرأنا سطرًا |
|
|
ما كانَ سحلبًا . |
| |
| على البابِ نقرةٌ |
|
|
تحتَ جنحِ النّهار. |
| |
| عن النّموّ . |
|
|
تُوقِفُ الحصانَ |
| |
| لَكِ في القلبِ |
|
|
(25) |
| |
| من قالَ إنِّي |
|
|
مستعمَرة . |
| |
| (26) |
|
|
أكرهُ الاستعمار ؟! |
| |
| تَقَرَّيْتُ صمتَ النّبيّةِ خمسًا |
|
|
على ضوءِ دمعَهْ |
| |
| (27) |
|
|
وركعَهْ |
| |
| يعرّيك . |
|
|
رأسُ \"الحُسَيْنِ\" |
| |
| إلى \"شرمِ الشّيخ\" . |
|
|
تهرول |
| |
| في عباءةِ \"السّلام\" . |
|
|
تختبئ |
| |
| دمعٌ يتساقط |
|
|
(28) |
| |
| محمّدٌ |
|
|
على بذلةِ العيد . |
| |
| وتذهبُ فاطمة |
|
|
يبكي بينَ يَدَيّ . |
| |
| لأوّلِ مرّةٍ |
|
|
لرؤيةِ عُمَر . |
| |
| (29) |
|
|
أبتعدُ عن العيد . |
| |
| على الهواء . |
|
|
مسؤولٌ |
| |
| ولا حطب . |
|
|
لا ماءَ في الأرضِ |
| |
| في إجازة . |
|
|
والسّماءُ |
| |
| البارجةُ في عرضِ الفقرِ |
|
|
(30) |
| |
| ينزلُ الجنود |
|
|
منذُ البارحة . |
| |
| جائعين . |
|
|
إلى شاطئِ الحبرِ |
| |
| فاخرة. |
|
|
الكتبُ عاهراتُ |
| |
| تتثاءب |
|
|
محافظُ النّقود |
| |
| (31) |
|
|
وتزني بعيونِها . |
| |
| أوّلَ أيّامِ العيدِ |
|
|
\"طلعت حرب\" ، |
| |
| لا مكانَ لإبرةٍ |
|
|
مساءً ، |
| |
| براحتِها . |
|
|
كي ترنَّ |
| |
| فضلاً عن الّذي |
|
|
(32) |
| |
| أمّ الدّنيا |
|
|
\"بَالِي بَالَكْ\" : |
| |
| والأهرام |
|
|
والنّيل |
| |
| في القاهرة |
|
|
\"وبتاع\" ، |
| |
| وحيفا والنّاصرة . |
|
|
شيءٌ من عكّا |
| |
| ويدٌ قصيرة . |
|
|
عينٌ بصيرةٌ |
| |
| لا يشبهونَ أشباهَهم |
|
|
أهلُها طيّبون |
| |
| مطحنةٌ |
|
|
في السّينما . |
| |
| أسمر . |
|
|
والقمحُ \"زَلَطٌ\" |
| |
| والدّمعُ نيلٌ |
|
|
الحزنُ خوفو ، |
| |
| (33) |
|
|
يصبُّ في السّماء . |
| |
| في رَحِمِ قصيدةٍ |
|
|
أراني جنينًا |
| |
| من ظَهْرِ حِبْرٍ |
|
|
راهبة .. |
| |
| (34) |
|
|
قُدُس . |
| |
| بسرطانِ السّماء . |
|
|
الأرضُ مصابةٌ |
| |
| \"عملنا اللّي علينا\" |
|
|
هل |
| |
| \"الباقي على ربِّنا\" ؟! |
|
|
لنلقي |
| |
| أوّلَ أيّامِ العيد |
|
|
(35) |
| |
| لا شيءَ مفتوحًا |
|
|
في القاهرة ، |
| |
| ما ينتظرُ المطر . |
|
|
سوى |
| |
| طفلٌ طويلٌ |
|
|
(36) |
| |
| تشيبُ لحيتُهُ |
|
|
من ليبيا |
| |
| منذُ ثلاثينَ لوحة . |
|
|
في القاهرة |
| |
| قالَتْ : |
|
|
(37) |
| |
| يا سيّدي. |
|
|
لا تظنَّنَ بي سوءًا ، |
| |
| ولم أخرج |
|
|
لسْتُ مدمنةً أنا ، |
| |
| تعرّيني عيونُكم ، |
|
|
من جلدتي . |
| |
| بالدّخان . |
|
|
فأتستّر |
| |
| طالَ غيابُ الحرسِ القديم ، |
|
|
(38) |
| |
| يعيّدُ في القلعة . |
|
|
ونصفُ المرعى |
| |
| في جيبِ العيد ، |
|
|
والمفتاح |
| |
| في إجازة ، |
|
|
والعيد |
| |
| خارجَ القاهرة ، |
|
|
والإجازة |
| |
| ليسَتْ جميلةً |
|
|
والقاهرة |
| |
| حزنُ القابلة . |
|
|
حينَ يفيض |
| |
| الكتب |
|
|
(39) |
| |
| أعضاءُ ناشطون |
|
|
لدى \"مدبولي\" |
| |
| يَرْقَى إلى المرّيخ . |
|
|
في تنظيمٍ |
| |
| مندهشًا من جرأتِه |
|
|
(40) |
| |
| وما عَبَّ من جعة ، |
|
|
وبتشجيعٍ من الضّجيج |
| |
| ويكتبُ على منديل . |
|
|
يسحبُ القلم |
| |
| تقطفُ الرّسالة |
|
|
يدٌ تفحُّ تحتَ المنضدة |
| |
| بعدَ ساعات |
|
|
وتخرجُ من البخار . |
| |
| ويذهب |
|
|
لا يتّفقان على مطر . |
| |
| |
|
|
كلٌّ إلى المطار . |
| |