| جيشَ الفُتونِ مُطرَّزَ الراياتِ |
|
|
هذا أبو بكرٍ يقودُ بوجههِ |
| |
| حرَّ المصيفِ فشبها لفحاتِ |
|
|
أهدى ربيعُ عِذاره لقلوبنا |
| |
| أهلُ الضَّلالِ لخدّهِ وَرِعاتِ |
|
|
صبتِ النفوسُ وقد أضلَّ كما صبا |
| |
| فاسوَدَّ مَجرى الماء في الجَمَراتِ |
|
|
خدٌ جرى ماءُ النعيمِ بجمره |
| |
| ما قد جنَتْ عَيناهُ في المُهَجاتِ |
|
|
كتَبتْ حُروفُ الشعرِ في وجَنَاتِه |
| |
| يبدو عليها رونقَ الحسناتِ |
|
|
فترى ذُنوبَ جُفونِه في خَدّه |
| |
| |
|
|
|
| |